Sunday, 30 Aug 2026
आर्टिकल्स

देवपुरा : अध्याय 2

देवपुरा : अध्याय 2 आजाद भारत का पहला आम चुनाव जिसमे संसद एवं राज्य विधानसभाओं के सदस्यों का एकसाथ चुनाव किया जारहा था | हांलाकि पुरे देश में कांग्रेस का बोलबाला था, चुनाव शांतिपूर्ण होने का अंदेशा था | वैसे कोई भी देश कितना भी शांतिप्रिय क्यों न हो चुनाव के स…

                                                             देवपुरा : अध्याय 2
आजाद भारत का पहला आम चुनाव जिसमे संसद एवं राज्य विधानसभाओं के सदस्यों का एकसाथ चुनाव किया जारहा था | हांलाकि पुरे देश में कांग्रेस का बोलबाला था, चुनाव शांतिपूर्ण होने का अंदेशा था | वैसे कोई भी देश कितना भी शांतिप्रिय क्यों न हो चुनाव के समय तनाव तो होता ही है और चुनाव का तनाव देवपुरा में कुछ ज्यादा ही था | देवशंकर और रविउल्लाह एक दुसरे के विरोध में थे |एक दुसरे को मात देने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे | देवशंकर उस क्षेत्र का जमीदार रह चूका था और रविउल्लाह गुमनाम वसिंदा था | इसी वजह से देवशंकर का पलड़ा भरी पड़ रहा था | इस बात से वाफिक रविउल्लाह एक बहुत ही खतरनाक एवं घिनौना खेल खेलता है वह चुराए गए हथियारों के साथ देवपुरा हवेली पर हमला कराता है | जिसका अंदेशा देवशंकर को नहीं होता है और वह मार दिया जाता है | पुरे क्षेत्र का माहौल गर्म हो जाता है | देवशंकर के हत्यारों की लिस्ट बननी सुरु होती है जिसमे रविउल्लाह सबसे ऊपर होता है | तनाव को देखते हुए उस विधान सभा की चुनाव रद्द होता है | रविउल्लाह गिरफ्तार होता है | माहौल के शांत होते ही चुनाव प्रक्रिया सुरु होती है | जिसमे देवशंकर का विश्वस्त लखपतिया निर्विरोध चुना जाता है, जिसे देवशंकर का बेटा, सत्रह वर्षिय देवधर सपोर्ट करता है | देवधर अपने उम्र से ज्यादा चालाक,बुद्धिमान एवं फुर्तीला था | दिल्ली की पढाई और वहां की राजनितिक माहौल ने उसे और भी योग्य बना दिया था | इंसानी नब्ज पहचानने की कला तो उसे विरासत में मिला था | उसके चरित्र में एक ही कमी थी कि वह अभी नाबालिग  था, जिसके वजह से चुनाव नहीं लड़ सका | रविउल्लाह के खिलाफ सारे सुबूत इक्कट्ठा करने के बाद उसे सुरक्षित रखते हुए एक दिन जेल में रविउल्लाह से  मिलने जाता है | देवधर बड़े ही साधारण ढंग से पूछा, “आप तो मेरे पिता जी के शुभचिंतकों में से थे | मै मानता हूँ कि आप दोनों में मतभेद थे लेकिन यह परिणिति होगी, विश्वास नहीं हो रहा” | रविउल्लाह का एकटूक जवाब था कि उसने देवशंकर को नहीं मारा | देवधर समझाते हुए कहता है, “देखिये चाचाजी मै वे सारे सुबूत रखा हूँ जिसमे आपका सारा कारनामा है | घटना स्थल से हथियार प्राप्त हुए हैं जो अंग्रेजों से लुटे गए थे इसी तरह के कुछ हथियार आपके घर से भी प्राप्त हुए हैं | अभी तक ये सुबूत पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े हैं यदि आप एकबार उस खजाने के बारे में बतादें तो मै आपको बचा सकता हूँ |” “कौनसा खजाना ?” रविउल्लाह अपने चेहरे पर प्रश्नचिन्ह लाते हुये पूछता है | “वही जो आप मस्जिद से लुटे थे |” देवधर की बात सुनकर रविउल्लाह छटपटाते हुए कहता है, “मैंने कोई भी चोरी नहीं की | वह सारा सामान देवशंकर ने लूटा था, मै..............” उसके बात को काटते हुए देवधर कहता है, “दो-तीन दिन में कोर्ट में आपकी पेशगी है,मेरे पास आपके खिलाफ पक्का सुबूत है जो एकही बैठक में आपको फांसी पर लटका देगी,यदि बचना चाहते हैं तो कल तक मुझे सब कुछ बता दीजिये नहीं तो फांसी का फंदा आपका इंतजार कर रहा है |” देवधर चला जाता है उसके बातों को जेलर सुन लेता है | वह तुरंत रविउल्लाह के पास जाता है और पूछता है, “देवधर किस खजाने की बात कर रहा था ?” रविउल्लाह बताता है, “अंग्रेजों से लूटा हुवा धन उस ध्वस्त मस्जिद में था लेकिन वहां से किसी ने लूट लिया तबसे वे सब यही जानते हैं कि मै ही उस खजाने को लूटा हूँ जबकि मैंने कभी कोई लूटपाट नहीं की और नाही मैंने देवशंकर की हत्या की |” “सोच लो सारे सुबूत तुम्हारे खिलाफ है,तारीख नजदीक है और तुम कुछ कर नहीं सकते |” जेलर धमकाकर चला जाता है | जेलर के जाने के बाद रविउल्लाह सोच में पड़ जाता है कि मेरे बताने के बाद मुझे सुरक्षित रखा जायेगा और मेरे खिलाफ जो सुबूत है उसे मिटाया जायेगा ? वह आगे सोचता है कि देवधर अपने पिता की हत्या का बदला जरूर लेगा और मुझसे राज उगलवाने के बाद मुझे मरवा देगा अतः मै चुप रहूँगा,यदि मुझे जिंदगी नहीं मिलेगी तो उन्हें खजाना भी नहीं मिलेगा | रात को सारे कैदियों के सोने के बाद जेलर एक बार फिर रविउल्लाह के पास जाता है और उससे बताता है, “अगली सुबह तुम पर थर्डडिग्री  का प्रयोग होगा जिससे तुम तड़प कर सब यूँही बक दोगे और तुम्हे फांसी पर तो लटकना  ही है देवधर जो सारे सुबूत इक्कठा कर लिया है |यदि तुम इस समय मुझे खजाने तक ले चलो तो मै तुम्हे आधे खजाने के साथ भगा दूंगा | तुम चुन सकते हो कि तुम्हे फांसी चाहिए या जिंदगी वो भी खजाने के साथ | वैसे मेरा अनुभव है कि हर आदमी को सबकुछ खोने के बदले उसे बचने के लिए सोच लेना चाहिए, भले ही हम कुछ पानसके लेकिन कुछ न करने का मलाल तो नहीं रहेगा और तुम्हे यहाँ तुम्हारे सफल होने की पर्याप्त संभावना है |’’ बात आगे बढ़ाते हुए जेलर फिर कहता है, “आखरी बार सोच लो, मै चलता हूँ, तुम्हारे पास सोचने के लिए अगले शाम तक का मौका है |” जेलर चला जाता है | इन्सान हमेसा असफलता से डरता है और अगर उसका सम्बन्ध जीवन से हो तो हालत समझ सकते हैं | रविउल्लाह सोचता है कि मेरे जिन्दा रहने का कोई कानूनी वजह तो है नहीं अतः वह जेलर के प्रस्ताव को चुनने का मन बनाता है और अगली सुबह जेलर को अवगत कराता है | रात को एक गुप्त योजना के तहत रविउल्लाह को जेल से बाहर निकाला जाता है | रविउल्लाह के बताए हुवे वीरान स्थान, जो देवपुरा की पुरानी ध्वस्त हवेली का सुरंग है, पर जाते हैं | वही पर अंग्रेजो से लूटा हुआ खजाना और हथियार सुरक्षित रखा गया था | अकूत खजाना और हथियारों के जखिरे को देखकर जेलर की आँखे सिकुड़ जाती हैं, अपने उड़े हुए होस से सोचता है कि क्या इतना धन भी होता है | अभी वे कुछ करते तभी पुलिस वहां पहुचती है और उन्हे बंदी बना लेती है | दोनों को जेल लाया जाता है और अलग अलग कक्ष में रखा जाता है | अगली सुबह देवधर रविउल्लाह से मिलने जेल आता है और फिर कहता है, “जनाब को जीने का बहुत शौक है| अब आपके बचने का कहीं कोई ठिकाना नहीं है रही बात बीती रात की तो उसका कही कोई सुबूत नहीं है | आपको बता दूँ वह सब मेरा सोचा-समझा और करा-धरा था | तभी जेलर आता है और बोलता है, “आपने तो सबकुछ बता दिया है फिरभी वहीँ हैं |” बौखलाहट में रविउल्लाह कहता है, “तुम दोनो ने मेरे साथ धोखा किया है |” “तुमने भी मेरे साथ धोखा किया था मै आज तुम्हारे वजह से अनाथ हूँ | क्या तुम मेरे पिता की छतिपूर्ति कर सकते हो ? नही | ये सब तुम्हारे धोखा के वजह से है | तुमने धोखा देकर सच को छुपाया हमने धोखा देकर सच उजागर किया | तुम समझते हो कि हमने कुछ गलत किया तो तुम गलत हो हमने सच का साथ दिया है और सच का साथ देने के लिए किया गया कोई भी काम गलत नहीं होता |” रविउल्लाह बौखलाहट में बोलता कि वह खजाने की सारी बात अदालत में बता देगा |” देवधर हल्के से मुस्कराते हुए चला जाता है | जेल में रविउल्लाह पागलों की भांति चिल्लाता है और कहता है, “ अंग्रेजों से लूटा हुआ धन और हथियार जिसे मै मस्जिद से लूटा था सबकुछ देवपुरा के पुरानी हवेली के खंडहर में सुरक्षित है और मैंने ही लालच में आकर देवशंकर की हत्या की थी |” बौखलाहट में वह भूल जाता है कि वह अपना ही अपराध स्वीकार कर रहा है | उसके इस बयान से पुरा महकमा अच्चम्भित हो जाता है | तुरंत एक पुलिस दल उस जगह पर जाती है लेकिन वहां पर केवल हथियार ही मिलते हैं | इसके बाद रविउल्लाह पर हथियार रखने एवं आतंक फ़ैलाने का केश चलता है | अदालत में सभी सुबूत उसके खिलाफ जाते हैं और वह अपराधी घोषित होता है | सजा सुनाने से पहले उसे कुछ कहने की अनुमति दी जाती है |  सारे असफलताओ के बाद वह अपनी बदनामी में देववंशियों को भी सामिल करने का प्रयास करता है | वह अदालत को बताता है कि वह किस तरह देवशंकर से मिलकर अंग्रेजों का खजाना और हथियार लूटता है लेकिन उसके इस आरोप को अदालत गलत बताता है क्योंकि सरकारी अभिलेखों में केवल हथियारों की लूट का जिक्र था उसमे किसी सम्पति का कोई ब्यौरा नहीं था | इसके बाद रविउल्लाह को असंवैधानिक ढंग से हथियार रखने, आतंक फ़ैलाने और देवशंकर की हत्या के आरोप में फांसी दी जाती है |  
D
Written by

Durgesh Kumar Singh