Sunday, 30 Aug 2026
कविता संग्रह

हादसा

हादसा तूं हंसी है एक परी की तरह, तुझे चाहाँ है देवी की तरह, तेरे होंठों की रंगत है मेरी चाहत, तेरे जुल्फों के छांव में मिलती है राहत | होता हूँ अकेला तो ये सोचता हूँ| सपनों में भी तुझे ढूढता हूँ | तुम बिन कटेगी कैसे जीवन की राहें | मिलने को तुझसे तड़पती हैं बा…

               हादसा

तूं हंसी है एक परी की तरह, तुझे चाहाँ है देवी की तरह, तेरे होंठों की रंगत है मेरी चाहत, तेरे जुल्फों के छांव में मिलती है राहत |   होता हूँ अकेला तो ये सोचता हूँ| सपनों में भी तुझे ढूढता हूँ |   तुम बिन कटेगी कैसे जीवन की राहें | मिलने को तुझसे तड़पती हैं बाहें |   मेरी अदाओं को तु पूजता है, अकल के अंधे तुझे क्या सुझता है | मै नहीं कोई देवी, हूँ तेरी दीवानी | दूरियां न बन जाये ये तेरी नादानी |   चाहत के मौसम को न जाने दो ऐसे, तेरे बिन अकले मै रहूंगी कैसे | आजाओ अब मुझे आवाज दो, मुहब्बत के रंग को एक अंदाज दो | उनकी राते यूँ ही कटते थे, खुद से बातें करते थे | उनके एहसासों में न कोई कमी थी, क्या उनपे किसी की काली निगाहें जमी थीं ?   नहीं | तो फिर क्या था ? तुमसे मिल कर मै सबकुछ बताऊंगा | दिल की हालत मै तुझको सुनाऊंगा |   नहीं मै सुनूंगी कोई दलीलें, मै तुझसे मिलूंगी आजही अकले |   देवांग की बातों को कौन मानता है, जो ऊपर वाले की करम जानता है |   गुजरें वो अपने गलियों से होके, चलती थीं कदमें हवा को छू के | फिर एक मोड़ पर एक पोल के नीचे, लगे करने बातें बेसुध होके |   तभी न जाने क्या ‘शक्ति’ को सुझा, गिरा बिजली का तार और दोनों ने साथ जूझा | मिट जातें हैं यूँ ही मिलने वाले , समझ लें आज से सभी दिलवाले |                                  2008 
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Written by

Durgesh Kumar Singh