(2005) राहों की परवा क्या करना वे तो मंजिलों की हमसफर हैं रास्ते तो बन जाते हैं लोगों के चलने से किस्तियाँ रूकती नहीं बिना मंजिल पर पहुचे तुफा की क्या बात है वे तो मंजिलों की श्रृंगार हैं तूं नहीं मेरी हमसफ़र तो क्या ये कवितायेँ ही मेरी यार हैं रास्तों पर चलना…