Sunday, 30 Aug 2026
कविता संग्रह

मंजिलें

(2005) राहों की परवा क्या करना वे तो मंजिलों की हमसफर हैं रास्ते तो बन जाते हैं लोगों के चलने से किस्तियाँ रूकती नहीं बिना मंजिल पर पहुचे तुफा की क्या बात है वे तो मंजिलों की श्रृंगार हैं तूं नहीं मेरी हमसफ़र तो क्या ये कवितायेँ ही मेरी यार हैं रास्तों पर चलना…

मंजिलें
(2005)
राहों की परवा क्या करना
वे तो मंजिलों की हमसफर हैं
रास्ते तो बन जाते हैं
लोगों के चलने से
                किस्तियाँ रूकती नहीं
                बिना मंजिल पर पहुचे
                तुफा की क्या बात है
                वे तो मंजिलों की श्रृंगार हैं
तूं नहीं मेरी हमसफ़र तो क्या
ये कवितायेँ ही मेरी यार हैं
रास्तों पर चलना है मुझे
क्योंकि मंजिलें ही मेरी प्यार हैं
                तूभी नहीं मंजिल मेरी
                मंजिलें भी मेरी कारवां हैं
                छोड़ते जाना है हर कदम पर एक मंजिल
                क्योंकि ! मंजिलों से ही मुझे प्यार है
दुर्गेश कुमार सिंह मंडल उपाध्यक्ष, भाजपा युवा मोर्चा, फाजिलनगर,कुशीनगर
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Written by

Durgesh Kumar Singh