Saturday, 29 Aug 2026
कविता संग्रह

हरबार

हरबार (sep.2020) गिरता हूं गहरा हरबार पिछली बार से ज्यादा हरबार उठता हूँ दुगना जो किया है खुद से वादा सर्पीली राहों पर मै बहता जाता हूँ नदिया हूँ पर सागर से मिलकर आता हूँ वक्त कठिन होता है पिछली बार से ज्यादा प्रतिदिवस देखता हूँ ऐसा सौ बार से ज्यादा आगे बढ़ना…

हरबार
  हरबार (sep.2020)   गिरता हूं गहरा हरबार पिछली बार से ज्यादा हरबार उठता हूँ दुगना जो किया है खुद से वादा   सर्पीली राहों पर मै बहता जाता हूँ नदिया हूँ पर सागर से मिलकर आता हूँ वक्त कठिन होता है पिछली बार से ज्यादा प्रतिदिवस देखता हूँ ऐसा सौ बार से ज्यादा   आगे बढ़ना है मुझको अपनी राहों पर मै चलूँगा और चलता रहूँगा मै चलूँगा और चलता रहूँगा जो खुद से किया हूँ वादा   कठिन परिस्थिति है सामने पर पीछे हटने का मन नहीं बढ़ता हूँ और बढ़ूँगा आगे हरबार, पिछली बार से ज्यादा   नियति से कोई जीत न पाता खेल ले कोई खेल कोई पर मै जीत के दिखलाऊँगा वक्त किसी की जागीर नहीं   कर्म बदलेगा खेल नियति का तब वक्त राह दिखलाएगा खुद पर तू कर भरोषा तूँ आगे बढ़ता जाएगा तूँ आगे बढ़ता जाएगा  
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Written by

Durgesh Kumar Singh