राहों पे चलते-चलते (2002)
राहों पे चलते-चलते (2002) राहों पे चलते-चलते खो गया मै कहीं सपनों की लहरों में बह गया मै कहीं खोकर पहचान अपनी रह गया गया मै अकेला | चाँद को छूलू उछला था समंदर की तरह गजब की साँस थी मुझमे पहचान न सका मै उसको और खोकर ‘नहीं’ में ज्वार-भाटा बन गया | न सोचा ना समझ…
