Sunday, 30 Aug 2026
कविता संग्रह

राहों पे चलते-चलते

राहों पे चलते-चलते (2002) राहों पे चलते-चलते खो गया मै कहीं सपनों की लहरों में बह गया मै कहीं खोकर पहचान अपनी रह गया गया मै अकेला | चाँद को छूलू उछला था समंदर की तरह गजब की साँस थी मुझमे पहचान न सका मै उसको और खोकर ‘नहीं’ में ज्वार-भाटा बन गया | न सोचा ना समझ…

राहों पे चलते-चलते
 राहों पे चलते-चलते (2002)
राहों पे चलते-चलते खो गया मै कहीं
सपनों की लहरों में बह गया मै कहीं
खोकर पहचान अपनी
          रह गया गया मै अकेला |
चाँद को छूलू उछला था समंदर की तरह
गजब की साँस थी मुझमे पहचान न सका मै उसको
और खोकर ‘नहीं’ में
                    ज्वार-भाटा बन गया |
न सोचा ना समझा छू लिया हर राहों को
खो दिया अपनी समझ, सुनके हर बातों को
रह गया बस ‘मै’ तक
                    कंगाल बन कर |
समझकर भूल अपनी चेता हूँ मै
दौड़ने की सोच में अभी बैठा हूँ मै
मुस्कुराता हूँ खुद पर,क्योंकि
                        अब पोस्टरों तक ही रहगया |
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Written by

Durgesh Kumar Singh