Sunday, 30 Aug 2026
कविता संग्रह

बिता पल

बिता पल 1 भूत की बात जब मै थी, वो था, हमारे बीच कोई था, तो वह था – प्यार भरी चाहत | मिलने की आस थी एकांत भी पास थी मृदुल बातें सपनो की रातें, सब थे कब थे ? कैसे थे ? यह सब बीता पल | 2 सिलसिला – मुलाकातों का चलता रहा दिनों तक करते थे बाते एक-दुसरे के बारे में…

             बिता पल

1 भूत की बात जब मै थी, वो था, हमारे बीच कोई था, तो वह था – प्यार भरी चाहत | मिलने की आस थी एकांत भी पास थी मृदुल बातें सपनो की रातें, सब थे कब थे ? कैसे थे ? यह सब बीता पल |   2 सिलसिला – मुलाकातों का चलता रहा दिनों तक करते थे बाते एक-दुसरे के बारे में जब सोते थे हम तो जागते थे सपने कितना हसीन था वह – बीता पल |    3 मै कहती – “तुम कितने अच्छे हो ? तुम कितने भोले हो  ? तुम्हारी बातें, तुम्हारा नजरिया सबकुछ मुझे रमता है |” जवाब था – “सादगी तुम्हारी भीनी भीनी तेरी मुस्कराहट, बातों की मृदुलता ये सब मेरे ह्रदय में छुरी मारते हैं |’’ ये हसीन बातें कुछ नहीं, सब बीता पल |     4 आज और अब हम दोनो  हैं साथ पूरी हो गयी वे सारी हसरतें जो थें सपने जमीन पर आगये परीलोक से घर से दूर शहर के एक मकान में- एक शिशु एक घर कुछ पैसे बहुत सारी खुशियाँ ये सपने बनगए जरूरत घर से निकले चार कदम कुछ दूर साथ चले फिर मुड गए अपने-अपने ऑफिस के तरफ सुबह से शाम बस यही परिणाम |     5    माहांत में लक्ष्मी खुश हम भी खुश मौसम आया गोदभराई का खुशियां अपार मिलें बार बार सपने फिर थे जमीन पर बुलंदियां आसमान पर |   6 प्रेम वात्सल्य सब थे समय बीता हसरतें बढीं दो राही था एक दिशा प्रबल हुयी इच्छा साथ चलने की गहरा हुआ चाहत दिल में थी राहत खुशियाँ थी अपार ये सब थीं उनके प्रेम एवं सामंजस्य का परिणाम |    7 फिर एक दिन, शाम, खाने के बाद शनि ने किया मुझपर वज्र प्रहार | प्रभाव – मेरे बातों का नहीं पड़ा उनपर तर्क विनय-निवेदन जीत ना सका उनका मन | मेरी क्या गलती थी ? मुस्कुरा कर या हंसकर उससे बातें करना | किसी ने  भरा था उनका कान मचाया था उनके दिल मे तूफान    8 बातें ये थीं रामप्रवेश मेरा सहकर्मी उसका भाई सन्देश वह भी मेरा सहकर्मी मै हंसमुख बातें करती थी सबसे सब करते थें मुझे पसंद मै – आशावादी कार्यकुशल अन्य भी गुण थे मुझमे उनकी त्रियक नजर बनी शनि की वज्र रचा षड़यंत्र मेरे जीवन में लाया भूकंप |    9 मै सोची वो बीता पल जब उसने कहा था – “तुम्हारी मुस्कराहट भरी बातें लोगों को बरबस रिझाने वाली मुस्कराहट सबकुछ मुझे अच्छा लगता है | और तुम्हारी बातें सबको पसंद आती हैं |” फिर आगे कहता – “तुम्हारी अदाएं मुस्कराहटभरी लगती हो जैसे कोई परी | तु हसरत है मेरी तु चाहत है मेरी तुझको मै पाऊं तुझपर जीवन लूटाऊँ|” इत्यादि इत्यादि     10 आज और अब माहौल था विपरीत मै सोची – यही अदा शादी से पहले लगती थी उनको भला | लोटते थे लट्टू की तरह | गाते थे पट्टू की तरह  | वही अदाएं आज उनको क्यों लगती हैं सर्पदंश जैसी ?     11 दूसरी सुबह चला फिर सिलसिला वार्तालाप का | शांत थे मगर रूठे हुए मै समझाई उन्हें- “मै हूँ जीवन संगिनी आपकी | धोखा नहीं फितरत मेरी आपके लिए मेरा दिल चाहत भरी बातें करना मुस्कुरा के क्या ये है आदत बुरी |” वे चुप सुनते रहे मेरी बातें मै फिर बोली – “क्या इतना कमजोर है हमारा प्यार कि एक झूठे व्यक्ति के शिकायत से डगमगा गया |” एक बारगी मुड़े मेरे तरफ मुस्कुरा कर फिर दुबारा कहे – “बातें तुम्हारी मुस्कराहटभरी लगती हो जैसे कोई परी | मेरे छोटे से दिल में ये बात है भरी कहीं खो न दूँ तुझे ऐ मेरी परी |   12 झूठे उलाहना झूठे बात अब ना देंगे चाटुकारों का साथ क्योंकि जागा था प्यार उनका खुलीं थीं ऑंखें | कम समय का बड़ा सा दर्द बना था एक हसीन मर्ज | संभलें थे दोनों चोट खाकर अब वो दर्दभरी बातें बिता पल      नवम्बर 11, 2006.    
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Written by

Durgesh Kumar Singh