अध्याय एक बात आज़ादी से कुछ साल पहले की है,जब पुर देश गाँधी, सुभाष,जवाहर,पटेल आदि क्रांतिकारियों के प्रभाव में था,हर मोड़ पर ब्रिटिश हुकूमत पस्त होती जारही थी |अंग्रेज अपने हार से परेशां हो कर,खिन्न हो कर अपना दमन चक्र चला रहे थे | उनकी लाठियों और बंदूकों की गर…
बात आज़ादी से कुछ साल पहले की है,जब पुर देश गाँधी, सुभाष,जवाहर,पटेल आदि क्रांतिकारियों के प्रभाव में था,हर मोड़ पर ब्रिटिश हुकूमत पस्त होती जारही थी |अंग्रेज अपने हार से परेशां हो कर,खिन्न हो कर अपना दमन चक्र चला रहे थे | उनकी लाठियों और बंदूकों की गरमाहट भारतीयों के मंसूबों को डिगा नहीं पारहे थे | हर जगह गाँधी के आंदोलनों की जगमगाट थी, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को मद्धिम कर दिया था, देश का अति पिछड़ा और देश से कटा भाग भी इस क्रांतिकारी लहर में मिलता जा रहा था | इसी क्रम में एक ऐसा भी जगह था जो पिछले कई सालों से अंग्रेजी हुकूमत को मानता आरहा था | वहाँ भारतीय पगड़ी तो थी लेकिन उस पर अंग्रेजी हुकूमत का मुहर लगा पंख था |वह कोई और जगह नही पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित छोटा सा रियासत देवपुरा था |
प्राचीन देवपुरा अपने ताकत,शानोशौकत,और सम्पन्नता के लिए जाना जाता था लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने उसके सारे सम्मान और अधिकारों को रौंद दिया था | अपने अपमान का बदला लेने के लिए देवपुरा के देववंशी छटपटा रहे थे आज़ादी के कुछ समय पहले की परिस्थितियां उनके अनुकूल थी |
देवशंकर यानि देवपुरा के जमीदार से मिलने एक अपरचित व्यक्ति आया, जिसने खुद को नवाबी सेना के प्रमुखों में से एक बताया | नवाबों के हालत ख़राब थे | अंग्रेज अपना दमन चक्र में किसी को बख्स नहीं रहे थे | जिससे त्रस्त होकर वह अपरचित व्यक्ति,रविउल्लाह,भागकर देवपुरा आया |
रविउल्लाह एक बहुत बड़ा लड़ाका एवं तोपची था | उसे युद्ध की समकालीन नवाबी तरीके के बारे में पता था | जिसे देवशंकर ने सैन्य प्रशिक्षण एवं तोप और गोले बनाने के काम पर नियुक्त किया | जिससे कुछ दिनों मे देवपुरा के पास तोपों से सुसज्जित एक छोटी सी सैन्य टुकड़ी तैयार हो गयी |
चूँकि देश का यह इलाका अक्सर शांत रहता था | जिससे अंग्रेज भी निश्चिन्त रहते थे और सैन्य ताकत का प्रयोग कम ही करते थे | यहाँ अंग्रेजों की कमजोर स्थिति एवं देश के विभिन्न भागों में क्रांतिकारियों की मजबूत स्थिति देवशंकर को प्रेरित कर रहा था | साथ मे रविउल्लाह एक प्रबल प्रेरक साबित हो रहा था |
देवपुरा से कुछ ही दूर पर अंग्रेजी हुकूमत का एक छोटा सा केंद्र था जहाँ हथियार और खजाना रखा जाता था | रविउल्लाह और देवशंकर की सेना बहुत ही योजित ढंग से अंग्रेजी खजाने पर धावा बोल देते हैं | रात का समय और अंग्रेजों की लापरवाही का फायदा उठा कर पूरा हथियार और खजाना लूट लेते हैं | युद्ध मे लूटा गया सामान देवपुरा के किसी गुप्त पर रखा जाता है |
सुबह होते ही इस घटना की सूचना आग की मानिंद फ़ैल जाता है लेकिन कोई भी इसका सुराग नहीं पा सका |आश्चर्य तब हुआ जब ऐसी घटना के बाद भी अंग्रेज शांत थे वैसे दुसरे पक्ष वाले भी मौन व्रत ले रखे थे |फिर भी जलने पर धुआ तो होगा ही और देवशंकर और रविउल्लाह में भी तो घबराहट थी |एक रात ब्रिटिश सेना ने अचानक देवपुरा को घेर लिया और हवेली पर छापा मार दिया | ब्रिटिश सेना पूरी हवेली छान मारी लेकिन कुछ भी नहीं मिला | औपचारिकता के लिए दोनों को बंदी बना लिया जाता है |
वे दोनों अभी जेल में थे तभी गाँधी के अन्दोलनो से परेशान अंग्रेज 15 अगस्त को देश को आजाद करने का फैसला सुनाते हैं | सबूतों के न मिलाने से दोनों बाइज्जत बरी कर दिए जाते हैं | आज़ादी की तैयारियां चल रही थीं, चारों तरफ क्रांतिकारी नेताओं की जय-जयकारा हो रही थी इसी बीच देवशंकर को खबर मिली कि आज़ादी के बाद जमीदारी प्रथा समाप्त हो जाएगी देवशंकर को अपना भविष्य खतरे में पड़ता महसूस होता है,अपने सलाहकारों के कहने पर वह अपनी चल-अचल संपत्ति का बड़ा हिस्सा अपने रिश्तेदारों में बेच देता है कुछ संपत्ति रविउल्लाह को भी देता है |
देश आजाद होने वाला था हर तरफ तैयारी चल रही थी लेकिन देवपुरा मे लालच की सुसुप्त ज्वालामुखी भी धधक रही थी | जिसने उस मस्जिद को जलाकर ध्वस्त कर दिया जिसमे लूट का धन और हथियार सुरक्षित था | वहाँ पर हुये रक्तपात मे चश्मदीद गवाह मस्जिद के स्टूडेंट भी मार दिए गए | इसी ध्वस्त मस्जिद के मलवे से देवशंकर और रविउल्लाह के बीच एक पक्की दिवार की नीव चलनी सुरु हो गयी | दोनों के बीच हुवे वाद-विवाद का पता अंग्रेजों को चला और पुनः दोनों गिरफ्तार कर लिए गए | जब दोनों जेल मे मिले तो उनके बीच आरोप-प्रत्यारोप सुरु हुआ जिसमे अपने अपने योगदान और कारगुजारियों को बकने लगे जिसे सुनकर अंग्रेज अधिकारी उन्हे अपराधी घोषित कर दिए |
जेल के बाहर के लोग इसे अंग्रेजों की दमन चक्र समझकर उन्हें ससम्मान रिहा करने के लिए क्रांति कर दिए 15 अगस्त नजदीक था और आजाद सरकार उन्हें रिहा करही देती | इसलिए अंग्रेज ज्यादा खतरा नही मोलते हुए उन्हें छोड़ दिए | दोनो क्षेत्र के नामी क्रांतिकारी मानलिए गए और देश आजाद होनेपर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी घोषित हुए |
यह तो थी आम जनता के बीच की बात लेकिन देवशंकर और रविउल्लाह के बीच वैमनस्यता जन्म ले चुकी थी वो खजाना कौन चुराया था यह चोर को छोड़ कोई नहीं जानता था लेकिन युद्ध सुरु हो चूका था | देवशंकर रविउल्लाह को और रविउल्लाह देवशंकर को जिम्मेदार ठहरा रहे थे | समय बितता गया और माहौल शांत होता गया लेकिन उन दोनो के बीच दूरियां बढती गयी देवशंकर सोचता रहा कि जो धन मैंने रविउल्लाह को दिया था उससे इतनी उन्नति नहीं किया सकता लेकिन वह शक के सिवा कुछ कर भी नहीं सकता था |
इधर रविउल्लाह अपने विरादरी में यह बात फैला रहा था कि मस्जिद वाले कांड का कर्ता-धर्ता देवशंकर ही हो सकता है |इन सब के बीच जो खेल खेला जा रहा था वह देवशंकर और रविउल्लाह के जीवन की दूसरी राजनीतिक पारी की सुरुआत थी |