पक्की ईट की दीवारों एवं घास-फूस के छज्जे से बना भव्य बंगला जिसमे बहुत दिनों से किसी तरह का कार्यक्रम नहीं हुआ था | लखपतिया उसकी साफ-सफाई कराता है | बंगला के चारों तरफ अच्छे किस्म के घास एवं सुन्दर पुष्पवृक्ष लगे थे | गौरैयां अपनी चहक एवं गिलहरियाँ अपने फुदकन…
पक्की ईट की दीवारों एवं घास-फूस के छज्जे से बना भव्य बंगला जिसमे बहुत दिनों से किसी तरह का कार्यक्रम नहीं हुआ था | लखपतिया उसकी साफ-सफाई कराता है | बंगला के चारों तरफ अच्छे किस्म के घास एवं सुन्दर पुष्पवृक्ष लगे थे | गौरैयां अपनी चहक एवं गिलहरियाँ अपने फुदकन से माहौल को और भी रमणीय बना रही थीं |
शाम चार बजे तक लगभग सभी कार्यकर्ता एवं पत्रकार बंगले पर एकत्रित होते हैं | इन सभी शुभचिंतकों के मुख पर प्रसन्नता की आभा दिखती है | वे सब इस बात से खुश हैं कि उनका नेता आज फिर से जाग गया है | देवशंकर की कमी पुरा करने वाला कोई आगया है | देवधर के पास कम उम्र के बावजूद अच्छा अनुभव था | रविउल्लाह के सफाए का किस्सा सारी जनता जानती थी
इधर देवधर भी मिटिंग में जाने की तैयारी कर रहा था | आईने के सामने जाने पर वह अचानक फफक पड़ा जैसे उसका टुटा दिल रिस रहा हो | अपने को संभालता तभी लखपतिया घर में आजाता है और उसके रुवांसी आँखों को देख लेता है | मामले को समझकर संभालते हुये बोलता है, “जिंदगी कुछ नहीं हरपल निर्णय लेने का क्रम है,हम जो भी करते हैं हमारे निर्णय लेने का परिणाम है,जो जैसा निर्णय लेता है वो वैसा ही बन जाता है | आपने एक सकारात्मक निर्णय लिया है,यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने अतीत में उलझे रहेंगे या भविष्य कि योजनाओं के लिए वर्तमान में काम करेंगे | अब आपको यह निर्णय लेना है कि देवपुरा का विकास करके किसी के यादों को गौरवान्वित करना है या यूंही जीवन गुजार देना है, सोचना सब आपको ही है |” देवधर गंभीर होते हुये कहता है “याद ?” तो लखपतिया बताता है कि उसे सब कुछ मालूम है | लखपतिया देवधर को भविष्य कि शुभकामनाये देते हुए उससे गले मिलता है फिर दोनों बंगले पर चले जाते हैं | मीटिंग के सञ्चालन की व्यस्था लखपतिया संभालता है | वह वहा उपस्थित सभी लोगों का स्वागत करता है | जनता के प्रति समर्पित देववंशियो के इतिहास पर प्रकास डालता है | देवशंकर के त्याग और देवधर की विकास के प्रति प्रतिबद्धता का भी व्योरा देता है | उसकी बातों में जान होती है उसकी भाषण के सम्मोहन में सभी बंध जाते हैं तभी लखपतिया का ध्यान देवधर के रुवांसे चेहरे पर जाता है, इस घटना को देवशंकर के पत्रकार मित्र केशवनाथ भी देखते हैं वे तुरंत लखपतिया को देवधर को संभालने के लिए इशारा करते हैं और खुद मंच का सञ्चालन करने लगते हैं | लखपतिया देवधर के पास बैठते हैं और उससे कहते हैं, “आप अपने भावनात्मक कमजोरियों पर नियंत्रण रखें,भले ही आजकी सभा में ज्यादे लोग नहीं हैं फिरभी परेसानी हो सकती है |” लखपतिया के इशारे पर केशवनाथ कार्यक्रम को ज्यादे लम्बा न खीचते हुये देवधर को अपने बातों को सार्वजनिक करने के लिए मंच पर बुलाते हैं | देवधर के घबराहट को नियंत्रित करने के लिए केशवनाथ कहते हैं,“राजनीती आपके खून में है, सेवा आपके संस्कार में बसा है, निर्णय लेना लोग आपसे सिखते हैं, परिस्थितिया कभी-कभी आपकी गुलाम लगती हैं इन सब के बाद भी मै आपसे आपकी राजनीती और उसके उद्देश्य के बारे जानना चाहूँगा |”
देवधर मंच से सबका स्वागत करते हुए संबोधित करता है और अपनी बात वही से सुरु करता है जहाँ से केशवनाथ उसे संबोधित किए थे, “ यह सच है कि राजनीती मेरे खून में है और सेवा मुझे विरासत में मिली है, वैसे मै आज ज्यादे देर तक तो नहीं टिक पाउँगा इसीलिए मै कम से कम समय में अपनी बात रखूँगा| इस मंच से मुझसे मेरे राजनितिक उद्देश्य के बारे में पूछा गया है तो मै बता दूँ कि देवपुरा का सर्वांगीण विकास ही मेरा उद्देश्य है वैसे आप सबको मालूम है कि यह कलियुगी महाभारत है इसमे एक ही व्यक्ति को कभी कृष्ण बनना पड़ता है, कभी अर्जुन बनना पड़ता है, कभी भीष्म बनना पड़ता है और कभी-कभी तो उसे सिखंडी भी बनना पड़ता है | मुझे देश कि भलाई, देवपुरा के विकास और आप सब की ख़ुशी के लिए जो कुछ भी बनना पडेगा, मै बनूँगा जो कुछ करना होगा, करूँगा | मै पहले ही बता चूका हूँ कि आज मै ज्यादे देर तक नहीं टिक पाउँगा अतः इन्ही सब बातों के साथ मै अपनी वाणी को विराम देरहा हूँ, फिरसे आप सबको प्रणाम |” इतनी सी कम उम्र में बहुत ही कम लोग इस तरह के तर्क दे पाते हैं |
सभा कि समाप्ति के बाद लखपतिया और केशवनाथ बड़ी ही संजीदगी के साथ अकले में कुछ बातें कर रहे होते हैं जिसे देवधर देखता है लेकिन सुन नहीं पाता है और कुछ अनुमान नहीं लगापाता है तो लखपतिया से पूछ लेता है, “यह सब सोची समझी एवं पूर्वनिर्धारित थी न ?” लखपतिया हँसता है और बिना जवाब दिए जाना चाहता है | तभी केशवनाथ कहते हैं, “ बेटा, यह आपकी सबसे बड़ी योग्यता है कि आप सही-सही अनुमान लगा लेते हैं लेकिन आप उसे सह नहीं पाते | आप अपने अनुमानों पर सकारात्मक होइए तथा अपने आपको संभालिए, आप बहुत सफल होंगे हमारी शुभकामनाए आपके साथ हैं |” देवधर लखपतिया के तरफ मुड़ते हुए कहता है, “आप मेरे बातों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं|” “कौन सी बात ?” लखपतिया पुछता है | तभी केशवनाथ हंसते हुए कहते हैं, “लड्डू कि बात हो रही थी |” “कौनसी लड्डू ?” देवधर फिर पुछता है | तब केशवनाथ कहते हैं, “आप अपने अनुमान में व्यस्त रहिए बात पता चल जाएगी |”