Sunday, 30 Aug 2026
उपन्यास

देवपुरा : अध्याय 6

देवधर अपने कमरे में बैठकर कुछ नोट्स तैयार कर रहा होता है | उसे आज अपने विद्यालय मे गणतंत्र दिवस की सभा को संबोधित करना है | वह सोच रहा होता है कि लोग क्या कहेंगे यदि मेरा भाषण ठीक ढंग से नहीं हुआ तो ......तभी अपनी सोच कि नकारात्मकता पर रोक लगाते हुवे वह खुद स…

देवपुरा : अध्याय 6
       देवधर अपने कमरे में बैठकर कुछ नोट्स तैयार कर रहा होता है | उसे आज अपने विद्यालय मे गणतंत्र दिवस की सभा को संबोधित करना है | वह सोच रहा होता है कि लोग क्या कहेंगे यदि मेरा भाषण ठीक ढंग से नहीं हुआ तो ......तभी अपनी सोच कि नकारात्मकता पर रोक लगाते हुवे वह खुद से कहता है, “लोग मुझे क्या कहेंगे मुझे इस पर ध्यान नहीं देना है, मेरा क्या उद्देश्य है मुझे क्या करना है,इस पर मुझे अपना ध्यान केन्द्रित करना है |आज मै अपनी भाषण से सबको प्रभावित करूँगा और मुझे यही बात सोचनी भी चाहिए |     देवधर समय से पहले ही विद्यालय में पहुचता है | वहां एक किशोर उससे मिलता है और उससे पूछता है, “श्रीमान हमारे प्रधानमंत्री महंगे कपड़ों पर लन्दन से आया गुलाब लगते हैं, राजसी ठाट से रहते हैं फिर भी हमारे देश को गरीबों का देश क्यों कहा जाता है ?”अभी वह कुछ और कहता उससे पहले देवधर कहता है, “मै आपके बातों का जवाब अपने भाषण में दूंगा, आप थोडा सा धैर्य रखिए |     यह देवधर का किसी सार्वजनिक मंच से दिया गया पहला भाषण था | वह थोडा सा घबराया था लेकिन उस किशोर से मिलने के बाद उसे एक उद्देश्य मिलगया था |     सहम से सबको संबोधित करने के बाद वह बोलता है , “आज 26 जनवरी यानि गणतंत्र दिवश है | यह वही दिन है जब हमने अपने संविधान की घोषणा की थी,अपने अधिकारों को परिभाषित किये थे और अपने भारत को विश्व का सबसे बड़ा संवैधानिक राष्ट्र घोषित किया था | इस पर्व को हम हर साल मनाते हैं लेकिन केवल इस लिए नहीं कि इस दिन हमने अपने संविधान कि घोषणा की थी बल्कि इस लिए भी कि हम अपने भावी नागरिकों मे देश के प्रति सच्ची निष्ठां,प्रेम और श्रद्धा पैदा कर सकें | उन्हे आज़ादी के महत्त्व बता सके लेकिन हमें तो यह बताया जाता है कि भारत गरीबों का देश है | इस कुंठाघाट का क्या औचित्य है ? अपने ही देश में अपने ही देश के भावी नागरिकों से अपने ही देश की बुराइयों का हास्यास्पद वर्णन किया जाता है | क्या वे अपने भावी नागरिकों को देश के प्रति कुंठित नहीं कर रहे हैं ? मै  मानता हूँ कि हममे कुछ खामियां हैं और हमें अपनी खामियां जानना चाहिए अपनी कमजोरियों को पहचानना चाहिए मगर बताने वालों को इन मासूमों को इसके परित्राण का सूत्र भी बताना चाहिए | हमारे देश का हर चिन्ह हर प्रतिक हर कण हर क्षण हमारे देश गुणगान करता है | राष्ट्रगान का हर शब्द देश का यशोगान करता है और यह तिरंगा जिसके लाल रंग को लोग बलिदान का प्रतिक मानते हैं लेकिन इसका अर्थ पूरब में निकलने वाले सूरज की की सुनहरी लालिमा से भी है जिसे हम ज्ञानोदय का उपमा देते हैं और शायद भारतवासी यह भूल रहे है कि हमारा देश ज्ञानोदय का देश है |     अभी कुछ दिन पहले पाकिस्तान समर्थित कबायलियों से हमें जख्म मिला | हमने युद्ध जीता अपना कुछ अंश खोया भी जिससे कुछ लोग कहने लगे हैं कि भारत युद्ध से डरता है, वह विदेशी दबाव में रहता है लेकिन ऐसा कुछ मैंने महसूस नहीं किया, देश को सहस्त्राब्दियों का अनुभव है | हमारे देश ने हजारों आक्रमकताओं  को झेला है और निष्कर्ष आया कि जंग में किसी की जीत नहीं होती नाही किसी कि हार होती है | होता ये है कि एक पहले मर जाता है और दूसरा तड़पने के लिए शेष रह जाता है मगर मानवता की हार जरूर होती है | युद्ध से कभी किसीको शांति नहीं मिलती,नरयुद्ध से कभी किसी को श्रेष्ठाधिकार नहीं मिलता यदि युद्ध से श्रेष्ठाधिकार मिलते और युद्ध से शांति स्थापित होती तो कभी भी महाभारत के बाद कलियुग की सुरुवात नहीं होती | हमारे देश के सदियों का अनुभव ने हमें बिना किसी युद्ध या हिंसक गतिविधि के देश को आज़ाद कराया | अंत में मै ‘भारत’ शब्द पर बोलूँगा | आपलोगों में से बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि भारत शब्द दो शब्दों से मिल कर बना है, पहला है ‘भा’ और दूसरा है ‘रत’| ‘भा’ का मतलब है ‘भासा’ यानि प्रकास और ‘रत’ का मतलब होता है लीन, व्याप्त या परिपूर्ण | इसका मतलब वह जगह जो प्रकास से परिपूर्ण हो | यह है भारत | अपने देश के प्रति अपनी सोच बदलिए और आगे बढिए | यही मेरा सन्देश है |                           धन्यवाद, जयहिंद | (इस अध्याय में भाषण के अंश २००३ मे लिखे मेरे एक भाषण से लिया गया है | जिसे मैंने अपने विद्यालय मे देने के लिए लिखा था |)          
दुर्गेश कुमार सिंह मंडल उपाध्यक्ष, भाजपा,युवा मोर्चा फाजिलनगर, कुशीनगर|
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Written by

Durgesh Kumar Singh