Sunday, 30 Aug 2026
उपन्यास

देवपुरा- अध्याय 4

अगर दिल से प्यार निकल जाये तो मन उदास, सूना एवं बिना धुन के बेसुरे गीत की तरह हो जाता है लेकिन नियति ने देवधर को उस लड़की से मिलकर और उसका दिल को तोड़कर यह बता दिया था कि निर्धनता किस तरह एक व्यक्ति के जीवन एवं परिवार को बर्बाद कर के निरुद्देश्य संघर्ष में ढकेल…

अगर दिल से प्यार निकल जाये तो मन उदास, सूना एवं बिना धुन के बेसुरे गीत की तरह हो जाता है लेकिन नियति ने देवधर को उस लड़की से मिलकर और उसका  दिल को तोड़कर यह बता दिया था कि निर्धनता किस तरह एक व्यक्ति के जीवन एवं परिवार को बर्बाद कर के निरुद्देश्य संघर्ष में ढकेल देता है | इस घटना ने उसे एक उद्देश्य दिया था और वह था- देवपुरा से निर्धनता का समूल नाश | जिसे पूरा करना उसे अपने प्यार को पाने  जैसा था |
     लखपतिया जानता था कि टूटे दिल को जोड़ने का दर्द और भी ज्यादा होता है लेकिन फिर भी वह देवधर के दिल के दरारों को भरने का प्रयास करता है | वह देवधर की शादी की बात चलाना चाहता है लेकिन देवधर यह कहकर टाल देता है कि मेरा दिल इतना बड़ा नहीं कि उसमे एक साथ दो लोग समा सके | लखपतिया के लाख समझाने के बाद भी देवधर शादी के लिए तैयार नहीं होता है | लखपतिया इसे समय पर छोड़ कर उसे दुसरे कामों में बहलाने का प्रयास करता है |
     देवधर को घर आये कई दिन हो गए थे लेकिन वह लोगों से नहीं मिलता था | किसी तरह से यह बात हवेली से बाहर पहुचती है | उसके मानसिक हालत पर लोग तरह-तरह की बातें करते हैं | कुछ दिन बाद यह बात देवधर को पता चलती है | दिल के चोट से मिले उद्देश्य और लोगों की बिच उठ रहे बातों के कारण उसे अपनी जिम्मेदारी का भान होता है और अब उसे आभास होता है कि वह आम इंसानों की भाति नहीं है जो अपने जिम्मेदारियों को छोड़ कर टूटे दिल को सहलाता रहे | ‘उद्देश्य ही सर्वोपरी है |’ सोचकर वह लोगों से मिलने की बात सोचता है |
     अगली सुबह देवधर लोगों से मिलने का अपना निर्णय सुनाता है | यह बात सुनकर लखपतिया बहुत ही खुश होता है | वह घोषणा करते हैं, ‘देवधर आज देवपुरा की जनता से मिलना चाहते हैं और गरीब जरूरतमंदों को भेट देना चाहते हैं |’ देवधर उन्हे टोकता है, ‘हम कोई भेंट नहीं देंगे, हम यूं ही जनता के बीच जायेंगे |’ लखपतिया उसे समझाता है, ‘लोगों की ख़ुशी से आपकी खोई पुरानी रौनक जल्द ही लौट आएगी |’ देवधर आप्पति जताते हुए कहता है, ‘लेकिन मेरा मानना है कि जमीन,धन,अनाज,कपड़ा आदि जरूरत की चीजों को दान करने से अच्छा है कि हम उनके रोजी-रोजगार के अवसरों को बढाने का तरीका ढूंढें, उनके शिक्षा पर खर्च करे, उन्हे इस योग्य बनाए कि उन्हें किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े और वे अपने पैरों पर खड़ा होकर गर्व से माथा ऊँचा कर सके | मै देवपुरा का समुचित समग्र विकास चाहता हूँ और यही मेरे राजनीतिक जीवन का प्रथम उद्द्देश्य है | लखपतिया समझाता है, ‘पैसे मे समाहित शक्ति को पहचानिए, इसकी शक्ति को सामाजिक शक्ति मे बदलिए और फिर इसे राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित कर दीजिए | यदि आपके पास पैसा है तो जरूरतमंदों की सहायता कर सामाजिक शक्ति प्राप्त कर सकते हैं और फिर सामाजिक शक्ति के द्वारा राजनीति के सिखर पर पहुँच सकते हैं |’ एक गहरी सांस लेते हुए आगे कहता है, ‘मुझे आपकी योग्यता एवं इच्छाशक्ति पर पूरा विश्वास है लेकिन जनता की आजकी मूलभूत जरूरतों पर भी ध्यान दीजिये | उनके आज के तपन और ठिठुरन को महसूस कीजिए |’ देवधर गंभीरता से कहता है, ‘मेरा उद्देश्य देवपुरा का विकास है और इसके लिए मुझे जो कुछ करना होगा करूंगा, शाम चार बजे अपने कार्यकर्ताओं से बंगले पर मिलूंगा |’ इसके बाद देवधर चला जाता है |
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Written by

Durgesh Kumar Singh