Saturday, 29 Aug 2026
उपन्यास

देवपुरा- अध्याय 3

देवपुरा का माहौल शांत हो चूका था | रविउल्लाह सहित सभी मामले से निपटने के बाद अपनी अधूरी पढाई पूरा करने के लिए वह दिल्ली चला जाता है | रविउल्लाह के मामले ने उसे उसके कालेज में हीरो बना दिया था | लेकिन यह पूरा प्रकरण उसके लगभग पुरे सत्र को ख़त्म कर देता है | परी…

 
    देवपुरा का माहौल शांत हो चूका था | रविउल्लाह सहित सभी मामले से निपटने के बाद अपनी अधूरी पढाई पूरा करने के लिए वह दिल्ली चला जाता है | रविउल्लाह के मामले ने उसे उसके कालेज में हीरो बना दिया था | लेकिन यह पूरा प्रकरण उसके लगभग पुरे सत्र को ख़त्म कर देता है | परीक्षा में चंद महीने बाकी थे | अतः अपने कोर्स को पूरा करने के लिए अपने अध्यापकों का सहारा लेता है | एक दिन वह नोट्स लेने के लिए अपने टीचर के घर जाता है | आँखों में आसमान और सीने में पहाड़ दबाये उस इन्सान पर पुष्प वज्र तब पड़ता है जब खनखनाती प्लेटों की आवाज उसके कानो में पड़ता है | जब वह आवाज के दिशा में मुड़ता है तो एक स्तब्धकारी चेहरा उसके सामने पड़ता | जिसके चेहरे का रंग सूर्योदय के उस पल के भांति होता है जब सूर्य अपनी रक्ताभा को छोड़ कर स्वेताभा को ग्रहण करता है | देवधर पूरी तरह से सम्मोहित हो जाता है | उसके पहाड़ जैसे दिल मे समंदर की लहरे उठनी सुरु होने लगती हैं | शायद देवधर यह नहीं जानता था कि इन्सान कितना भी चालाक क्यों न हो, परिस्थितियां उसे कितना भी परिपक्व क्यों न बना दें, वह अपने ऊपर पड़ने वाले उम्र के प्रभाव से बच नहीं सकता विशेष कर तरुणाई में जब हमारा मन प्राकृतिक रूप से कोमल एवं भावुक होता है |

            कब चाय का प्याला खाली होता है और कब नोट्स तैयार होता है इस पुरे घटनाक्रम मे देवधर को कुछ पता नहीं होता है | हाँ उसके गंभीर चेहरे पर कभी-कभी मुस्कान आती रहती है | अपना नोट्स समाप्त करके अपने रूम पर लौट आता है | अगली शाम पुनः उस टीचर के घर जाता है | दरवाजा खटखटाने पर अन्दर से आवाज आयी, “घर पर कोई है नहीं बाद में आईयेगा |” देवधर अपने बारे में बता कर लौटता है तभी दरवाजा खुलता है और देवधर पीछे मुड़ता है तो दरवाजा अचानक बंद हो जाता है लेकिन देवधर का उद्देश्य पूरा होजाता है | धीरे-धीरे उस घर पर देवधर का आना जाना बढ़ता है दोनों में नजदीकियां बढती हैं आमने सामने होते हैं लेकिन बात, बात तक नहीं पहुचती | उनके नजदीकियों को देख कर उस टीचर में चिढ आती है वह बहुत ही परेशान हो जाता है | एक दिन जब देवधर उसके घर के पास पहुचता है तो उसे अन्दर से डाट सुनाई देती है | वह सहमा और रुका लेकिन अन्दर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और वहीँ से लौट आया |

     आज उससे पढाई भी ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा था | उसे बार-बार वो डांट-फटकार याद आरहा था और वजह जानने के लिए तरह-तरह तर्क खुद को दे रहा था | अंत में वह तय किया कि कल इस बाबत उस लड़की से पूछेगा | वह हिम्मत जुटाकर वहाँ जाता है, कुछ पूछना चाहता है तो वह लड़की पहले ही बोल देती है, ‘उन्हें हमारा आमना-सामना पसंद नहीं है, कृपया करके आप यहाँ मत आयें बाबूजी |’ ‘बाबूजी’ शब्द सुनकर ठनकता है और समझ जाता है कि यह एक गंवई भाषा है, कुछ बोले तभी लड़की बोलती है, ‘आपको सारा मामला एक-दो दिन में पता चल जायेगा, शायद हम कभी मिल न पायें हमें माफ़ करना बाबूजी |’ देवधर कुछ पूछता उससे पहले दरवाजा बंद कर देती है | वहां से लौटने के बाद देवधर की परेशानी और भी बढ़ जाती है | वह बार-बार इस रहस्य को जानना चाहता है लेकिन सोचों के भंवर जाल में उलझ कर रह जाता है |

     ठीक तीसरे दिन देवधर को एक डाक-पत्र मिलता है | पत्र कुछ इस प्रकार था-‘बाबूजी हम दूर गांव के एक गरीब की बेटी हैं | हमारे बाप के मर जाने के बाद माई ने इस    कमीने के पल्ले बांध दिया और अपने जिम्मेदारी से निवृत हो गयी | आज हम जो जिल्लत की जिंदगी जी रहे हैं उसके बाद कोई भी हमे स्वीकार नहीं करेगा | जबतक आपको पत्र मिलेगा हमारा चिता जल चूका होगा | कृपा कर के हमें भुला दीजिएगा और हमें -----------’ इससे आगे वह पत्र नहीं पढ़ता है और आनन-फानन में उसके घर पहुचता है | वहाँ उसे पता चलता है कि उस लड़की ने आत्महत्या कर ली है और पोस्टमारडम के बाद उसकी अंतिम संस्कार करदिया गया था | पोस्टमारडम रिपोर्ट के अनुसार अभी वह नाबालिग थी तथा पेट से थी | पुलिस कार्यवाही में वह टीचर गिरफ्तार होता है |

     इस घटना के बाद देवधर का पहाड़ जैसा दिल प्यार के समुद्री तूफान में डूब जाता है | उसके आँखों के सामने अन्तरिक्ष का गहरा अँधेरा छा जाता है | एक कुटिल व्यक्ति का मस्तिष्क गहरे भावुकता में बहने लगता है, उसकी यह भावना उसके विचारों को, साहस को, गंभीरता को और आसमान को जीतने की चाहत को मार देती है | निस्तेज, निढाल, निर्भाव वह बिस्तर पर पड़ जाता है | उसकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ने लगती है | उसके मित्र उसके घर खबर करते हैं | विधायक लखपतिया अगले ही दिन दिल्ली पहुचता है | डॉक्टर वजह में शारीरिक कमजोरी एवं मानसिक आघात बताते हैं, और सलाह देते हैं कि इस तरह की परेशानिया उम्र के प्रभाव से भी होते हैं जो माहौल चेंज होने पर ठीक भी हो जाते हैं | लखपतिया देवधर को लेकर गांव आजाता है |

     दिन बितते जाते हैं | देवधर को व्यस्त रखने का प्रयास किया जाता है | देवधर खुद अपने कामो को संभालने का प्रयास करता है लेकिन उसकी फफकती भावनाएं उसे एकांत मे खीच लाती हैं | लखपतिया हमेशा उसके साथ रहता है, उसके व्यवहारों को गौर से देखता है और निष्कर्ष निलालाता है- ‘एक व्यक्ति आर्थिक असफलता को झेल सकता है, राजनीतिक हार मे लोग उसे संभाल सकते हैं लेकिन इस उम्र में दिल टूट जाये तो उसे जोड़ना एक फरिश्ते के ही वश में होता है | लखपतिया इसे राजनितिक दृष्टिकोण से भी देखता है और सोचता है कि कहीं कोई देवधर के दिल के साथ खिलवाड़ तो नहीं किया है | इसी परिप्रेक्ष्य में वह दिल्ली जाता है | वहां वह कालेज के प्रिंसिपल, अध्यापक और उसके मित्रों से मिलता है लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुचता | अंत में वह देवधर के रूम पर जाता है जहा उसे एक पत्र मिलता है | लखपतिया पत्र पढ़कर सारा माजरा समझ जाता है | पत्र समेट कर वह थाने जाता है जहाँ यह मामला दर्ज था | वहां उसे पता चलता है कि उस टीचर को उम्रकैद हो गयी है | इसके बाद वह देवपुरा लौट आता है |
 
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Written by

Durgesh Kumar Singh