मै ढूढरहा हूँ सुख
कागज के नोटों में
मै देख रहा हूँ लोकप्रियता
अख़बारों के पन्नों मे और सिनेमा के पर्दों पर
बदलती जा रही है धारणाएं
आज सुख, सेवा और लोकप्रियता की
क्यों भटक रहा है आदमी
और ढूढता नहीं सुख
अपनी आत्मा की संतुष्टि मे
क्या अंधा हो रहा है आदमी
जो देखता नही लोकप्रियता
अपने आत्मा के प्रसार मे
ऐ मानव तूं सेवा क्यों नही देखता
अपने आत्मा के परिष्कार मे
2005



