📅 15 Oct 2026“साहित्य समाज का दर्पण है, और विचार बदलाव की शुरुआत।”
Motivational

जीत हो या हार हो

प्रेरक कविता

जीत हो या हार हो

जीत हो या हार हो 

भ्रस्टाचार पर प्रहार हो 

चक्र समय का घूम रहा

स्वल्प का संहार हो

देवस्थापना हो चुका

अब देवत्व का प्रसार हो

कुचक्र बाहें फैलाए है

इनका भी संहार हो

सुमानष कमजोर न हो

कर-करा तूं करता चल

सुभ्र समय है ये भी

विकास के प्रकार रच

सेवा,संस्कार और समर्पण

नए तरह से करता चल

सहज किया है सब अबतक

संघर्ष की लकीरें रचता चल

विजय, विकास और विस्तार

यही होंगे तेरे चमत्कार

पद विकृत हुआ है तो क्या

संघर्ष का तूं है अवतार

05-06-2024

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Written by

DURGESH KUMAR SINGH

“मन के भावों की उत्कृष्ट उद्गार ही रचनात्मकता है।”