📅 15 Oct 2026“साहित्य समाज का दर्पण है, और विचार बदलाव की शुरुआत।”
कविता संग्रह

राहों पे चलते-चलते

खो गया मैं कहीं

राहों पे चलते-चलते

राहों पे चलते-चलते खो गया मै कहीं

सपनों की लहरों में बह गया मै कहीं

खोकर पहचान अपनी रह गया गया मै अकेला |

चाँद को छूलू उछला था समंदर की तरह

गजब की साँस थी मुझमे पहचान न सका मै उसको

और खोकर ‘नहीं’ में,ज्वार-भाटा बन गया |

न सोचा ना समझा छू लिया हर राहों को

खो दिया अपनी समझ, सुनके हर बातों को

रह गया बस ‘मै’ तक,कंगाल बन कर |

समझकर भूल अपनी चेता हूँ मै

दौड़ने की सोच में अभी बैठा हूँ मै

मुस्कुराता हूँ खुद पर,

क्योंकि                        

अब पोस्टरों तक ही रहगया |

2002

D
Written by

DEWANG SHAKTI"DURGESH"

“मन के भावों की उत्कृष्ट उद्गार ही रचनात्मकता है।”