राहों पे चलते-चलते खो गया मै कहीं
सपनों की लहरों में बह गया मै कहीं
खोकर पहचान अपनी रह गया गया मै अकेला |
चाँद को छूलू उछला था समंदर की तरह
गजब की साँस थी मुझमे पहचान न सका मै उसको
और खोकर ‘नहीं’ में,ज्वार-भाटा बन गया |
न सोचा ना समझा छू लिया हर राहों को
खो दिया अपनी समझ, सुनके हर बातों को
रह गया बस ‘मै’ तक,कंगाल बन कर |
समझकर भूल अपनी चेता हूँ मै
दौड़ने की सोच में अभी बैठा हूँ मै
मुस्कुराता हूँ खुद पर,
क्योंकि
अब पोस्टरों तक ही रहगया |
2002



