📅 15 Oct 2026“साहित्य समाज का दर्पण है, और विचार बदलाव की शुरुआत।”
कविता संग्रह

मंजिलें

ये कविताएँ ही मेरी यार हैं।

मंजिलें
(2005)
राहों की परवा क्या करना
वे तो मंजिलों की हमसफर हैं
रास्ते तो बन जाते हैं
लोगों के चलने से
                किस्तियाँ रूकती नहीं
                बिना मंजिल पर पहुचे
                तुफा की क्या बात है
                वे तो मंजिलों की श्रृंगार हैं
तूं नहीं मेरी हमसफ़र तो क्या
ये कवितायेँ ही मेरी यार हैं
रास्तों पर चलना है मुझे
क्योंकि मंजिलें ही मेरी प्यार हैं
                तूभी नहीं मंजिल मेरी
                मंजिलें भी मेरी कारवां हैं
                छोड़ते जाना है हर कदम पर एक मंजिल
                क्योंकि ! मंजिलों से ही मुझे प्यार है

 

D
Written by

Durgesh Kumar Singh

“मन के भावों की उत्कृष्ट उद्गार ही रचनात्मकता है।”