तूं हंसी है एक परी की तरह,
तुझे चाहाँ है देवी की तरह,
तेरे होंठों की रंगत है मेरी चाहत,
तेरे जुल्फों के छांव में मिलती है राहत |
होता हूँ अकेला तो ये सोचता हूँ|
सपनों में भी तुझे ढूढता हूँ |
तुम बिन कटेगी कैसे जीवन की राहें |
मिलने को तुझसे तड़पती हैं बाहें |
मेरी अदाओं को तु पूजता है,
अकल के अंधे तुझे क्या सुझता है |
मै नहीं कोई देवी, हूँ तेरी दीवानी |
दूरियां न बन जाये ये तेरी नादानी |
चाहत के मौसम को न जाने दो ऐसे,
तेरे बिन अकले मै रहूंगी कैसे |
आजाओ अब मुझे आवाज दो,
मुहब्बत के रंग को एक अंदाज दो |
उनकी राते यूँ ही कटते थे,
खुद से बातें करते थे |
उनके एहसासों में न कोई कमी थी,
क्या उनपे किसी की काली निगाहें जमी थीं ?
नहीं |
तो फिर क्या था ?
तुमसे मिल कर मै सबकुछ बताऊंगा |
दिल की हालत मै तुझको सुनाऊंगा |
नहीं मै सुनूंगी कोई दलीलें,
मै तुझसे मिलूंगी आजही अकले |
देवांग की बातों को कौन मानता है,
जो ऊपर वाले की करम जानता है |
गुजरें वो अपने गलियों से होके,
चलती थीं कदमें हवा को छू के |
फिर एक मोड़ पर एक पोल के नीचे,
लगे करने बातें बेसुध होके |
तभी न जाने क्या ‘शक्ति’ को सुझा,
गिरा बिजली का तार और दोनों ने साथ जूझा |
मिट जातें हैं यूँ ही मिलने वाले ,
समझ लें आज से सभी दिलवाले | 2008



