हम जैसे लोगों के लिए शहर एक बहुत ही आकर्षक जगह होती है | वहाँ का जीवन आज के मोबाइल एरा में किसी से छुपा नहीं है | सरपट भागती गाड़ियाँ सर के उपर से गुजरता मेट्रो और घरों के भीतर की लग्जरियस लाइफ ये सब हमे भुतकाल के लोगों की कल्पना का मूर्तरूप जैसा लगता है | आज से कुछ दशक पहले जो चीजें कल्पना थी आज वो प्रत्यक्ष रूप में दिख रही हैं | शहर आजीविका का उद्दगम स्थल हुआ करता था,आज भी है बस रूप-रंग बदल रहा है | शहर में देश के तीस प्रतिशत लोग रहते हैं लेकिन वे विकास में पुरे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं |
वक्त के साथ शहर के पीछे गाँव भी बदल रहे हैं| आज के आधुनिक गाँव शहर की संरचना को टक्कर दे रहे हैं | बदलते परिवेश में गाँव भी पर्यटन के लिए अपनी दावेदारी कर रहे हैं |
ये घटना भी इसी दावेदारी को पुख्ता कर रही है |
बात शम्भूशरण पाण्डेय जी का है | जिनकी नतिनी पहली बार गाँव घूमने आती है | पाण्डेय जी पहले भी कई बार शहर जाकर उससे मिले होते हैं और उसे कई बार गाँव घूमाने का प्रयास ही किये होते हैं लेकिन कभी पढाई के नाम पर तो कभी गाँव की विपरीत और जटिल वजह से उसे गाँव आने से रोक दिया जाता है | लेकिन इसबार आना इसलिए पक्का था क्योंकि पाण्डेय जी ऑन बेड थे और उनकी आखिरी इच्छा नतिनी को गाँव घूमने की थी |
नतिनी की आतुरता भी पाण्डेय जी से मेल खा रही थी |
मै शम्भू जी और उनके नतिनी की बात तो कर रहा हूँ लेकिन उनके बेटों के बारे में बताना भूल जा रहा हूँ |
पाण्डेय जी के दो बेटे थे, बड़े कुलश्रेष्ठ पाण्डेय और छोटे ब्रह्मानंद पाण्डेय |
कुलश्रेष्ठ पाण्डेय जी का बाल विवाह हुआ था, कम उम्र में बच्ची पैदा होने से पत्नी का स्वर्गवास हो गया और कुलश्रेष्ठ जी गाँव-घर छोड़ के कहीं चले गए | बहुत ही जांच पड़ताल हुआ लेकिन कुछ पता नहीं चला | थक-हार कर पाण्डेय जी दुसरे बेटे की शादी का निर्णय लिया जो ब्रह्मानन्द जी को मंजूर नहीं था | वे किये क्या कि एक रात अपनी भतीजी को उठाये और कहीं गायब हो गए |
पाण्डेय जी सत्तर के दशक के तीव्रगति से कथित विकासशील भारत के युवाओं की भाति सोचते थे कि संतान ज्यादा पढ़ ले तो जी के जंजाल होते हैं और ये बात उन्हें तब सही लगी जब बड़ा बेटा पत्नी वियोग में अदृश्य हो जाता है और छोटा उसकी नवजात संतति को लेकर भाग जाता है |
इन सब के बाद भी दृढ इच्छाशक्ति के धनी पाण्डेय जी बिना किसी बदलाव के अपनी सुखी जीवन जीने लगते हैं | उनके दकियानूसी जीवन में सही की ख़ुशी तब आती है जब उनके पास एक कॉल आता है कि उनकी नतिनी अब चलने लगी है और बा-बा-बा कहती है | उनके अदृश्य कुंठित दिल से निकले उद्दगार उनके आंसुओं से दृश्यमान होने लगते है | वे तुरंत अपने बेटे और नतिनी से मिलने बताये पते पर बनारस के लिए चल देते हैं |
उन्हें दुगनी ख़ुशी तब मिलती है जब वहां पहुचने पर उन्हें अपने बड़े बेटे से भी मुलाकात होती है लेकिन आतुरता नतिनी से मिलने की होती है |
मिलते ही पुछते हैं, “नाम क्या है ?”
दोनों बेटे सहमे डरते हुए बोले, “ब्यूटी”
आज वही ब्यूटी आज अपने मरणासन्न दादा से मिलने गाँव पहुची थी |
