प्रजातंत्र की रणभूमि मे, विगुल कभी बज सकता है । कौटिल्य के “शतरंज”मे, “गो”की नीति भी चल सकता है। वादों के प्रचार में, विवादों का प्रपंच चल...

आजाओ मिलने

  • By DURGESH KUMAR SINGH
  • January 13, 2025

मेरे कहानियों मे तूं बहुत मशहूर है। सुना है तूं भी मेरे इश्क मे मजबूर है। तेरा इंतेजार करता हूँ अब भी मगर ये वक्त भी बड़ा...

जीत हो या हार हो

  • By DURGESH KUMAR SINGH
  • June 5, 2024

जीत हो या हार हो भ्रस्टाचार पर प्रहार हो चक्र समय का घूम रहा स्वल्प का संहार हो देवस्थापना हो चुका अब देवत्व का प्रसार हो कुचक्र...