Sunday, 30 Aug 2026
कहानियाँ

झूठ की ज़ागीर

पिछले 26 जनवरी को एक महाविद्यालय में मैं भाषण दे रहा था। मै पिछले 70 सालों की सरकारों की कर्मों एवं कुकर्मों पर बोल रहा था।कांग्रेस की असफल कुटिलता जिसे हम आज झेल रहे हैं, पर मै छोटा सा व्याख्यान दिया। चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो या तीन तलाक, राम मंदिर मामला…

पिछले 26 जनवरी को एक महाविद्यालय में मैं भाषण दे रहा था। मै पिछले 70 सालों की सरकारों की कर्मों एवं कुकर्मों पर बोल रहा था।कांग्रेस की असफल कुटिलता जिसे हम आज झेल रहे हैं, पर मै छोटा सा व्याख्यान दिया। चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो या तीन तलाक, राम मंदिर मामला हो या सी ए ए इन सभी पर कांग्रेस की अदूरदर्शी सोच और वर्तमान सरकार की सही संदर्भों में अभिव्यक्ति सब पर थोड़ा सा बोला।चुकि मेरे बोलने की शैली लिखने की शैली से खराब है,इसीलिए एक मित्र जो सपा के किसी फैसले से लाभान्वित थे को मेरी बातें नागवार गुजर रही थी। वैसे उनके माथे पर धर्म का सिंदूर जरूर होता है लेकिन वाणी में कुटीलता एवं व्यग्रता ही रहती है, एकदम बेचैन थे कुछ पल बाद मैं संचालक महोदय को धन्यवाद ज्ञापित कर मंच से नीचे आया। बड़े भाई बेचैन थे उनका शरीर दाएं से बाएं हो रहा था बेचैनी इतनी थी कि खुद को रोक नहीं पाए और मुझे एक कोने में बलात खींच ले गए। - क्या बात है भाई? - मै आपकी बातों से सहमत नहीं हूं आप जो कहे वह सब झूठ है देश के विकास में अन्य पार्टियों का भी योगदान है खासकर कांग्रेस का। - मैंने कब कहा कि देश के विकास मे कांग्रेस का हाथ नहीं है ? - आपने तो पूरा का पूरा ठिकरा कांग्रेस पर फोड़ा है और सारा का सारा श्रेय भाजपानीत सरकार को दिया है। गांधीजी का समर्थन करते हो और झूठ भी बोलते हो । मेरा सीधा सा जवाब था- मैने कुछ भी झूठ नही कहा और हां-गांधी जी के भक्त हैं, इसका मतलब यह नहीं कि झूठ आप के बाप की जागीर हो गई है। हिम्मत हो तो सार्थक एवं रचनात्मक पहल कीजिए मंच आपका इंतजार कर रहा है। भाई साहब का रुझान अपनी कुर्सी के तरफ था।
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Written by

Durgesh Kumar Singh