मैं जब से राजनीति में आने की सोचा, तब से तीन पीएम हुए। उन तीनों की कुछ बातें मुझे बहुत पसंद आईं—
पहले अटल जी— "हम नहीं चाहे कि हम राजनीति में रहें, ये राजनीति है जो मुझे छोड़ती नहीं।"
दूसरे मनमोहन जी— "रोज सुबह जब मैं उठता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि मुझे आज परीक्षा देनी है और दिनभर की आपाधापी के बाद मैं रिजल्ट की खोज करता हूँ लेकिन सब अँधेरे में रहता है। ये सब मेरी रोज की दिनचर्या है।"
और तीसरे 'सबका साथ, सबका विकास' की धारणा से काम करने वाले हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी— "न खाऊँगा और न खाने दूँगा।"
इन्हीं से प्रभावित हो मैं कहता हूँ— हम भाजपाई काम की राजनीति पसंद करते हैं, काम में राजनीति
नहीं।



